अब केंद्रीय विद्यालय में क्या प्रार्थना होगी, यह भी कोर्ट बतायेगा?
सुप्रीम कोर्ट में केंद्रीय विद्यालय में होने वाली प्रार्थना को हिंदुत्व से जोड़ने वाली याचिक पर सुनवाई ने आज ये स्पष्ट कर दिया है कि आँखों से अन्धा कानून आज मानसिक रूप से विक्षिप्त व् कमजोर भी हो चुका है जो भारतीय संस्कार ,संस्कृति के अस्तित्व और ईश्वरीय प्रार्थना को हिंदुत्व के एजेंडे से जोड़ कर देखने के प्रयास को बल देने वाली याचिका पर सुनबाई कर रहा है !
याचिका पर सुनवाई को हम आज हास्यास्पद होने के साथ साथ किसी मिशनरी द्वारा कानून को की गई फंडिंग या फिर हास्य कलाकार कपिल शर्मा की बढ़ती लोकप्रियता से जलन के रूप में भी जोड़ कर देख सकते है और ये प्रतीत होता है कि आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट देश के नागरिको के लिए न्याय के नहीं बल्कि मनोरंजन के प्रमुख स्तम्भ के रूप में कार्य करेगा !
क्योकि देश के केंद्रीय विद्यालयो में टाक झाँक करने से पहले सुप्रीम कोर्ट को मुस्लिम और ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित विधालयो पर प्रतिक्रिया देने की जरूरत है जो भारतीय संस्कृति रुपी माँ की कोख से जन्मे बच्चे को उच्च शिक्षा का हवाला देकर माँ को मदर ,पिता को फादर कहने पर मजबूर
करते है और कट्टर पंथ की राह पर चला कर भाई को ही भाई के विरुद्ध खड़ा करते है
और अगर ईश्वरीय प्रार्थना आपकी नज़रो में असंवैधानिक है तो अन्य मिशनरी द्वारा संचालित विधालयो में उनकी ईश्वरीय शक्ति से सम्वन्धित प्रार्थनाये कैसे संवैधानिक हो सकती है और अगर आज बात केन्द्रीय विद्यालय में हो रही प्रार्थना पर की जाए तो में ये स्पष्ट कर दूँ कि इसी प्रार्थना की बजह से आज देश में अमन और शांति का माहौल हमे देखने को मिल रहा है अगर इस प्रार्थना का उच्चारण आज विद्यालयों में बंद कर दिया जाए तो कल देश का भविष्य कहा जाने वाला युवा कश्मीर घाटी की तरह ही देश के हर प्रदेश में अपने कंधो पर स्कूली बेग की जगह AK 47 जैसे हत्यारो का बोझ उठाते हुए दिखाई देगा !
इसलिए सुप्रीम कोर्ट को चाहिए की वो अपनी महत्वता को समझे और समाज से जुड़े अहम मुद्दों पर संज्ञान ले नहीं तो वो दिन भी दूर नहीं जब देश की इस उच्च न्यायपालिका में भी लोग निर्णय आने पर कपिल शर्मा के मनोरंजन शो की तरह ही ठहाके लगाते हुए दिखाई देंगे



